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इस्‍लाम में सहिष्‍णुता

इस्‍लाम में सहिष्‍णुता का उचित अर्थ किसी विरोधी की राय या अमल के विरूद्ध सब्र का इजहार करना है। सहिष्‍णुता का यह मफहूम बहुत सारे लोग के लिए हैरत का कारण बना सकता है। जो सहिष्‍णुता को केवल ‘कुबूलियत’ या इत्‍तेफाक के बराबर मानते है। एक देश जहॉं विभिन्‍न धर्मां के मानने वाले लोग अमन व शांति के साथ जीवन व्‍यतीत कर रहे हों वहॉं इस्‍लाम के सहिष्‍णुता की अवधारणा यह है कि मुसलमान अपने दीन पर कायम रहते हुए उस देश की अमन व शांति का ख्‍याल रखें और जब कभी कोई महौल खराब करता नजर आए तो आवश्‍यकता है कि इस्‍लाम में सहिष्‍णुता की अवधारणा पर अमल करे और अपने प्रतिद्वंद्वी की अतिवादी व्‍यवहार पर सब्र व बर्दाश्‍त से काम ले।

इस्‍लामी शरीअत का सच्‍चे दिल से अध्‍ययन किया जाए तो अंदाजा होता है कि इसका उद्देश्‍य असल में अमन व शांति का कायम है। अमन के कयाम के लिए जब कभी सब्र व तहम्‍मुल से काम लेने की आवश्‍यकता पड़े तो इस्‍लाम इसकी शिक्षा भी बड़े सुन्‍दर अंदाज में देता है, चाहे यह सब्र व तहम्‍मुल सामाजिक‍,सांस्‍कृतिक,जातीय,आदिवासी,धार्मिक या घरेलू स्‍तर पर हो। असहिष्‍णुता जो हत्‍या,नरसंहार हत्‍या, धार्मिक अत्‍याचार व हिंसा, अन्‍याय और फसाद का कारण बनता है, इस्‍लाम इसकी भरपूर निंदा करता है और अपने मानने वालों को इससे रोकता है।

विविधता में सहिष्‍णुता

इस्‍लाम ने विविधता को इल्‍म वालों के लिए अल्‍लाह की निशानियों में शुमार किया है, जैसाकि कुरआन का फरमान है‘और उसकी निशानियों से हम आसमानों और ज़मीन की पैदाइश और तुम्‍हारी जुबानों और रंगों का मतभेद बेशक इसमें निशानियॉं हैं, जानने वालों के लिए’ (30:22)1 यह आयात बताती है कि आसमान और ज़मीन के निर्माण में और रंग और जुबानों में भी मतभेद अल्‍लाह की निशानियों में शामिल है। इंसान विभिन्‍न नस्‍लों में बटे हुए है जिसकी जिस्‍मानी‍ बनावट और रंग भी भिन्‍न है। इनमें कुछ का रंग सफेद और कुछ का काला है। ‘इल्‍म वाले’ इस बात को आसानी से समझ सकते है।

अल्‍लाह ने यह भी फरमाया

‘लोगों हमने तो तुम सबको एक मर्द और एक औरत से पैदा किया और हम ही ने कबीले और बिरादारियॉं बनायी ताकि एक-दूसरे की पहचान कर सके, इसमें शक नहीं कि ख़ुदा के नजदीक तुम सबमें बड़ा इज्‍ज़तदार वहीं है जो बड़ा परहेज़गार हो बेशक अल्‍लाह जाने वाला खबरदार है’। (49:13)

हम्‍बली फकीह कहामा अल मुकद्दसी लिखते है (अरबी से अनुवाद) ‘इस्‍लाम स्‍वीकार करने के लिए किसी भी गैर मुस्लिम को मजबूर करने की अनुमति नहीं है। ऐसे वयक्ति को मुसलमान भी नहीं समझा जाएगा जब तक कि इस बात का प्रमाण नहीं मिल जाता कि उसने अपने स्‍वतंत्र व्‍यवहार के साथ इस्‍लाम धर्म कुबूल किया है।’

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